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Monday, 22 April 2019

#पिता-सुता#

क्यूँ उसके 
युवा यक़ीन को,
अपने अनुभवों से
मात दूँ,
उसके सच की उम्र,
ज़्यादा बची नहीं अब,
पर ख़ुद को फुसलाते,
लगता है कुछ दूर
और साथ दूँ

मेरा अक़्स 
दिखता है उसमें,
जब भी बोलती है 
वह तान भवें,
गर्दन की अकड़न
भी ठीक वैसी ही है,
अभी आदर्श उसके
मिलावटी नहीं हुए

डरता हूँ 
उस दिन से,
जब लगेगी 
पहली ठोकर,
क्या संभल पायेगी 
वो ख़ुद से,
या गिर पड़ेगी 
लड़खड़ाकर

समझ में आता नहीं,
छोड़ूँ हाथ उसका
किस मुक़ाम पर
या साथ चलता रहूँ
शाम के साये की तरह,
छुप छुपाकर

मेरा अंश है वो,
उसकी आशाओं का
ध्वंस नहीं देख सकता,
पिता हूँ,
सुता के ख़ातिर

मैं तटस्थ नहीं रह सकता

Monday, 4 March 2019

# कब तक भला किसके लिए #

जमीं सारी बंजर पड़ी,
रास्ते काँटे भरे,
पर्वत सीना तान,
राह रोके खड़े हुए,
नदी भी इठलाती मचलती,
बहती रही,
रूकती नहीं एक पल के लिए,
वो लड़ता रहा सोचता रहा,
कब तक भला किसके लिए

लोगों की क्या बात करे,
सर्द हवायें भी दुदकार रही,
धरती पे कैसी ये जन्नत है,
हर वक़्त सिर्फ़ मौत,
पुकार रही,
बँधे हाथ और होंठ सिले,
वो लड़ता रहा सोचता रहा,
कब तक भला किसके लिए

अपने पराए की क्या पहचान,
घूरती निगाहें पहने नक़ाब,
पत्थरों का बारूद से,
क्या दे जवाब,
अपनी साँसों में
ज़िंदगी का भरोसा लिए,
वो लड़ता रहा सोचता रहा,
कब तक भला किसके लिए

निकला जब भी वर्दी पहने,
यही ख़याल रहता दिल में,
लौटे शायद जब अपने घर को,
तिरंगे में ना हों लिपटें,
क्षत विक्षत सारे सपने,
आशंकित सोच झटकते हुए
वो लड़ता रहा सोचता रहा
कब तक भला किसके लिए.......





Saturday, 26 January 2019

#श्रद्धांजलि# ज़िंदगी क्षमा करो इस बार ...मिलेंगे फिर किसी अगले राह ..कि इस सफ़र के लिए माँग लिया है मैंने  ...साथ मौत का ....अब कुछ पल चलूँ इसके संग ....कि देखूँ मेरी जीत पे अबकी कैसी होती है जश्न ...जानूँ तो इस दफ़ा किसने निभाई वफ़ा ...कौन मुँह मोड़ चल दिया  बेग़ानो सा ...कि चाहता हूँ यह भी इस बार... हो आँसुओं की भी बरसात ...फूलों के साथ ..कि संग लिए चला हूँ ...ज़िंदगी का ज़हर ...कि इस जीत के साथ ही  ...ख़त्म हो जाए मेरा हर सफ़र.....   

Friday, 18 January 2019

ख़ुदा ही मिला विसाल--सनम 

अब कह ही दो,
तुम किस तरफ़ हो ?
शामिल हो 
गर्दिश में मेरे,
या बेपरवाह 
यूँ ही खड़े हो ?

कुछ बातें बाँटी थी
ख़िलाफ़ ख़ुदा के
कल तुमसे,
भरोसे के साथ
कि दिल में तेरे,
वे रहेंगी दफ़न

अब गूँज रहे हैं
ज़माने भर में,
हर हर्फ़ 
उस गुफ़्तगू के,
मुझे तो,
ख़ुदा ही मिला 
विसाल--सनम 




Thursday, 29 November 2018

# कहीं और...कोई और #

अब ख़ुदा भी समझता नहीं दिल की बात,

दुआ कुछ और करता हूँ,
दवा कुछ और देता है ।
दीया रौशनी का जला, दावत ज़िंदगी को दी,
साँसे किसी और को बख़्शीं,
जला कोई और करता है।

इसी उम्मीद में सफ़र ज़िंदगी का जारी है,

मुझे नहीं तो 'उसे' मंज़िल का पता होगा !
गुम है मेरी तरह वो भी,
बस इल्ज़ाम किसी और पे धरता है ।

उल्फ़त की फ़ितरत भी अजीब बेचैन है,

निगाहे किसी और पे टिकती है,
दिल किसी और को ढूंढ़ता है।

ना जाने ज़माने को किसने ख़बर दी है,

घर किसी और गली में है,
पर ये शख़्स कहीं और रहता है।

Wednesday, 21 November 2018

# तमाशबीन #

तमाशबीन बन ये
मुस्कुराते चेहरे,
मेरे गर्दिश का 
जश्न मना रहे

मेरी आँखों में
बसे रहने को,
आतुर थे जो,
आज मेरे साये से 
भाग रहे नज़रें चुराए

वो हैं अभी भूले,
कि मेरे तराशे हुए,
पत्थरों की गर्द,
बेशक़ीमती है 
उनके रत्नो से,
हथेली में ज़ब्त 
पसीने की महक,
खींच लाएगी 
गुमी बूलन्दी सपनों से

जो कल तक था मेरा,
फिर से लौट आएगा,
कोई गुमान नहीं 
यक़ीं का सहारा है,
फिर से मेरी आँखों की चमक,
दिखाएगी राह ज़िंदगी को,
ये ज़िद मेरी है 
और ये साथ तुम्हारा है

ओझल हुए साये को,
धूप सुबह की,
फिर से नए 
आकार देगी,
मेरे भटके हुए 
अंधेरे रास्तों को,
जुगनू तेरे दामन के 
सवाँर देंगे

लौटूँगा मैं बनकर,
फिर से दरवाज़े की दस्तक,
तू इस बार भी खड़ा होगा
तमाशबीन बना,
इंतज़ार में मेरे तत्पर









Wednesday, 14 November 2018

#खेल कठपुतलियों का#

दर्द की 
बौछार को
काग़ज़ों पे 
उतार दो
कुछ तो कहो
कुछ तो लिखो
वेदना को
शब्द से सँवार दो 

समझेगा कौन 
रोएगा कौन
व्यर्थ की इस 
सोच को विराम दो
नासूर न बन 
जाए ये ज़ख़्म
हर ग्लानि अब 
दिल से निकाल दो

जो तुमने किया 
वो वक़्त की पुकार थी
जो तुमसे हुआ 
वो नियति की ही चाल थी
अधिकार से परे 
था सब तेरे
तेरी मौजूदगी 
ईश्वर की ढाल थी

डोर से बँधी 
तेरी पहचान है
तू जीत गया 
तो उसका एहसान है
ये खेल है सारा 
कठपुतलियों का
हारा तो परिणाम 
है तेरी ग़लतियों का

Saturday, 3 November 2018

# अधूरी ज़िंदगी #

ज़माने की झुर्रियों में
उलझी हुई, कहानियाँ कई,
कुछ गुम गई, कुछ सुनी नहीं
कुछ अधूरी रह गई ।

आँगन की जर्जर होती दीवार से,
झाँकती ख़ामोश सुराखे,
गुज़रती सर्द हवा 
समेटती बिसरी हुई दास्ताँ ।

तुम कहाँ हो, हूँ मैं कहाँ 
राफ़्ता नहीं कोई दरमियाँ
नज़रों से ओझल हो चले,
हर मंज़िल हर एक रास्ता ।

तुमसे सुनी थी जो बातें,
जान पड़ता है सिर्फ़ ख़्याल थे,
छुआ था जो तुमने मुझे कभी,
हवा का झोंका था और कुछ भी नहीं ।

ढूँडू कहाँ अब किस तरफ़,
या भूल जाऊँ सब ख़्वाब समझ,
हर दास्ताँ ज़िन्दगी की उलझी हुई,
कुछ गुम गई कुछ सुनी नहीं ।
................................
कुछ रह गईं अधूरी।

Sunday, 28 October 2018

#संघर्षरत#

हर एक राह से
गुज़रना होगा,
कि किस राह परे
है मंज़िल,
हर विष बूँद को
पीना होगा,
कि किस बूँद 
में छिपा है अमृत ।

अब झुलसे बिना
इस आग में,
निखरने को नहीं
है ज़िंदगी,
अब खोए बिना
स्याह रात में,
दिखने को नहीं
है रौशनी ।

हर रात अब
जागना होगा,
कि कब आ रही
है चाँदनी,
हर धड़कनों को
रोकना होगा,
कि कहाँ गूँज रही
है रागिनी ।

अब पिये बिना
आँसुओं को,
मिलने को नहीं
है ख़ुशी,
अब दफ़नायें बिना
संवेदनाओं को,
आने को नहीं
है हँसी ।

हर ज़िंदगी को
मरना होगा,
कि किस मौत में
छुपा है जीवन,
हर एक नयन
होगा झाँकना,
कि कहाँ तैर रहा
है रुदन

अब तेरे आये बिना
इस संसार,
मिलने को नहीं
है राह,
अब बिना बरसे
नयनों के तेरे,
बुझने को नहीं
है ये आग 


Monday, 22 October 2018

# ख़ामोश क़दम लाचार नहीं #

क्षमा करो शर्मिंदा हूँ
कि मरा नहीं, ज़िंदा हूँ
ख़ुद के वज़न को तौलता
गर्दन से लिपटा फंदा हूँ

चालाक नहीं मजबूर था
रिश्तों को समेटना दस्तूर था
तुम्हारी भेदती नज़रों का
थोड़ा लिहाज़ तो ज़रूर था

गुम हुआ नहीं अभी मौजूद हूँ
अपनी आवाज़ के पीछे ख़ुद हूँ
साँसों में गरमाहट, है अभी तक
तू ज़ेहन में है और क्या सबूत दूँ

पहुँचा वहीं, चला था जहाँ से
जलाया जिसे, जला उसी शमा से
अफ़सोस नहीं ख़ाक होने का
जी उठूँगा ख़ुद अपनी दुआ से

हार सही, तिरस्कार नहीं
नज़रों से गिरना स्वीकार नहीं
मंज़िल कब तक चुरायेगी नज़र
ख़ामोश क़दम इतने भी लाचार नहीं




Tuesday, 16 October 2018

# नियति #

चलो चले अब यहाँ से 
ये कारवाँ थम सा गया है
किसी और डगर की बाँह पकड़े
निकले फिर से मंज़िल अनजाने

रुक के भला इस बिएबाँ में
कौन चेहरों में शक्लें ढूँढे
चुपचाप निकल चलो यहाँ से
सिर झुकाए आँखें मूँदे

किस मंज़िल जाना है इसे
रास्ते को तो होगी ही ख़बर
मैं भी यही राह पकड़ लेता हूँ
ले जाए मुझे अब चाहे जिधर 

मोड़ों पे मुड़ जायेंगे इसके
मिली जो छाँह रुकेंगे कुछ पल
लक्ष्य प्राप्ति का दायित्व न होगा
न जीत हार को कोई कपट छल

बैठ किनारे लहरों को सवारूँ
या आँहें भर पर्वत निहारूँ
वक़्त की कोई पाबंदी न होगी
काँधे पे डाले हसरतों का बोझ
किसी और की ज़िंदगी ना होगी

चल पड़ूँगा निडर, नियति सहारे
पुकारेगा काल जब बाँहें पसारे 
संग सिर्फ़ मैं होऊँगा और शौक़ मेरे
क्या ख़ूबसूरत नहीं ये दिवास्वप्न मेरे ?












Thursday, 11 October 2018

#बातें अभी अधूरी हैं#

कुछ और बचा हो,
तो अभी ही कह डालो,
फिर वक़्त मिले ना मिले,
ज़िंदगी ये रहे ना रहे 

मैं जानता हूँ,
बातें अभी अधूरी हैं 

अभी तो खुलने,
शुरू हीं  हुए है 
यादों के पन्ने,
अभी तो इन पन्नों
के बीच भी,
बहुत कुछ छिपा है,
कुछ सूखे हुए फूल,
कुछ टुकड़े काग़ज़ों के,
कई लकीर पड़े होंगे
बने रंगीन धागों से,
कुछ स्याहियों से उकेरे 
निशान भी होंगे,
कई भूल गए
ऐसे नाम भी होंगे,
कुछ संदेश सा,
महत्वपूर्ण होगा लिखा,
पर अर्थहीन, बेमतलब 
आज के लिए

मैं जानता हूँ,
बातें अभी अधूरी हैं

अभी तो उजाले में ही
खोए हुए हो तुम,
रात तो पूरी बाक़ी है,
अभी तो इनके बीच
कई शामें भी होंगीं,
कुछ ख़्वाब होंगे,
कुछ परछाइयाँ होंगीं,
आज झूठे से जो लग रहे,
वो सचाइयाँ होंगीं,
कई पुकार होंगीं,
जो तेरे लिए थी,
कई शब्द होंगे,
जो मैंने कहे थे,
कुछ क्षण होंगे
जब तू रोई थी,
कई पल होंगे
जब मैं हँसा था

मैं जानता हूँ
बातें अभी अधूरी हैं

अभी तो ज़िंदगी 
की हीं चर्चा है,
फिर मौत की भी बारी है,
अभी तो इनके बीच,
गुज़रना है कितनी साँसों को,
अभी तो कई 
अनदेखे ख़्वाब है,
अनसुलझे सवालों के,
मिलने जवाब हैं,
ना जाने अभी कितनी बार,
गुज़रना है उन्ही राहों से,
ले के सहारा तेरी बाँहों का,
अभी तो दामन में तेरे,
कई फूल हैं गिरने 
कई काँटे हैं उगने,
अभी ही मत चल दो
तुम मुँह मोड़ के 

मैं जानता हूँ
बातें अभी अधूरी हैं



Sunday, 7 October 2018

# किसी का दोष नहीं #

तुझसा ना होने का अफ़सोस नहीं
तू क़ातिल है, कोई सरफ़रोश नहीं

नज़रंदाज हो रहे गुनाह तेरे अबतक
बेपरवाह है तू, ज़माना ख़ामोश नहीं 

और दिखा तू ज़ुल्म का जलवा हमें 
बदहवास हुई है आहें, मदहोश नहीं

चीख़ें ख़ुदबख़ुद दब गई टीलों में रेत के
तूफ़ाँ, दरिया, लहरें किसी का दोष नहीं

मज़ा आ रहा देख मंज़र तेरे कारनामों का
खुले राज सभी, आया फिर भी होश नहीं

मुक़र गए ग़वाह सभी, तेरे ज़ुर्म के 
ख़ौफ़ है तेरी हुकूमत का, तू निर्दोष नहीं 

समझ रहा कि दुनिया दामन में है तेरे
परिंदे हैं, रहते किसी के आग़ोश नहीं



Wednesday, 3 October 2018

# साथी ज़िंदगी के #

अकेले नहीं आयी
यह ज़िंदगी
साथ है इसके 
और कई 

हँसी है प्रीत है
सुख है गीत है
और साथ में खड़े 
हाँथ बाँधे, नज़रें झुकाए 
है द्वेष, दुःख, आँसू भी 

पर ये तो
प्रतिपल परिवर्तित 
होते हुए, ज़िंदगी से 
कभी दूर तो कभी पास
हैं खड़े रहते

अधीर हुआ मन
बदल लिया तब
दुःख को गीत से
आँसू को प्रीत से
द्वेष को मीत से 
ये कहीं भी, कभी भी
शाश्वत नहीं

पर वो,
साथ जन्मा है जो ज़िंदगी के
अभी तक पास है उसी के
हँसा जब भी ज़ोर से
बीच में ही टोका उसने
आँसुओं को भी
अविरल बहने से रोका उसने

उसकी प्रीत मेरा गीत
हैं बँधे सभी उसी से
कण कण है व्यस्त 
उसी के ख़िदमत में
क्षण क्षण हो रहा व्यतीत
उसी की चाह से
भटक रही है ज़िंदगी
उसी के दिखाए राह में 

वो देन हैं, या फिर
ईश्वर की चूक
ये अंगिनित आँकक्षाएँ 
यह अमिट भूख